भावपूर्ण गज़लें

श्री मुनव्वर राणा

हर उस बेटे के नाम
जिसे माँ याद है !

माँ – 1

इस चेहरे में पोशीदा है इक क़ौम का चेहरा
चेहरे का उतर जाना मुनासिब नहीं होगा

अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की ‘राना’
माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है

मुसीबत के दिनों में हमेशा साथ रहती है
पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है

पुराना पेड़ बुज़ुर्गों की तरह होता है
यही बहुत है कि ताज़ा हवाएँ देता है

किसी के पास आते हैं तो दरिया सूख जाते हैं
किसी के एड़ियों से रेत का चश्मा निकलता है

जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा

देख ले ज़ालिम शिकारी ! माँ की ममता देख ले
देख ले चिड़िया तेरे दाने तलक तो आ गई

मुझे भी उसकी ज़ुदाई सताती रहती है
उसे भी ख़्वाब में बेटा दिखाई देता है

मुफ़लिसी घर में ठहरने नहीं देती उसको
और परदेस में बेटा नहीं रहने देता

अगर स्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिन्दों के न होने पर शजर अच्छा नहीं लगता

माँ – 2

हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं

हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह

सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,

माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।
तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा


श्री आलोक श्रीवास्तव

अम्मा

चिंतन दर्शन जीवन सर्जन

रूह नज़र पर छाई अम्मा

सारे घर का शोर शराबा

सूनापन तनहाई अम्मा

उसने खुद़ को खोकर मुझमें

एक नया आकार लिया है,

धरती अंबर आग हवा जल

जैसी ही सच्चाई अम्मा

सारे रिश्ते- जेठ दुपहरी

गर्म हवा आतिश अंगारे

झरना दरिया झील समंदर

भीनी-सी पुरवाई अम्मा

घर में झीने रिश्ते मैंने

लाखों बार उधड़ते देखे

चुपके चुपके कर देती थी

जाने कब तुरपाई अम्मा

बाबू जी गुज़रे, आपस में-

सब चीज़ें तक़सीम हुई तब-

मैं घर में सबसे छोटा था

मेरे हिस्से आई अम्मा

बाबू जी

घर की बुनियादें दीवारें बामों-दर थे बाबू जी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था
अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी

भीतर से ख़ालिस जज़बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी

कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी


श्री कुँवर बेचैन

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक

चाँदनी चार कदम, धूप चली मीलों तक

प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर

खत्म होती ही नहीं दु:ख की गली मीलों तक

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी

खुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक

माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़ कर बरसी

मेरी पलकों में जो पीर पली मीलों तक

मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा

बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक

हम तुम्हारे हैं ‘कुँवर’, उसने कहा था इक दिन

मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक


बशीर बद्र

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता

बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता

हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में
अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता

तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता

मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इन्सान तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहता

कोई बादल हरे मौसम का फ़िर ऐलान करता है
ख़िज़ा के बाग में जब एक भी पत्ता नहीं रहता


एम.के.बजाज
आंचलिक प्रबंधक
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
पटना अंचल

नग़में प्यार के

नग़में प्यार के यूँ ही गाए नहीं जाते

सितम जो किए सितमग़र को बताए नहीं जाते।

 

दिल की बातों को जबाँ पे लाया नहीं जाता,

मोतियों को आँखों के, यूँ ही गिराया नहीं जाता।

 

दिलों को ज़ख्मों को दिखाया नहीं जाता

हर नग़मा हर साज़ पे गाया नहीं जाता।

 

हमारे दीदार को तरसेंगे हमारे अहबाब,

हम रहें न रहें, हमारे अल्फाज़ ज़िन्दा रहेंगे।

 

इतनी आसानी से हबीबों को भुलाया नहीं जाता

दिल की बातों को ज़बाँ पे लाया नहीं जाता।