युवा कवियों की संवेदनशील कविताएँ

अनामिका

मृत्यु

उसकी उमर ही क्या है !
मेरे ही सामने की
उसकी पैदाइश है !
पीछे लगी रहती है मेरे
कि टूअर-टापर वह
मुहल्ले के रिश्ते से मेरी बहन है !

चौके में रहती हूँ तो
सामने मार कर आलथी-पालथी
आटे की लोई से चिड़िया बनाती है !
आग की लपट जैसी उसकी जटाएँ
मुझ से सुलझती नहीं लेकिन
पेशानी पर उसकी
इधर-उधर बिखरी
दीखती हैं कितनी सुंदर !

एक बूंद चम-चम पसीने की
गुलियाती है धीरे-धीरे पर
टपके- इसके पहले
झट पोंछ लेती है उसको वह
आस्तीन से अपने ढोल-ढकर कुरते के !
कम से कम पच्चीस बार

इसी तरह
हमको बचाने की कोशिश करती है।
हमारे टपकने के पहले !
कभी कभी वह
लगा देती है झाड़ू घरों में!
जिनके कोई नहीं होता-
उन कातर वृद्धाओं की
कर देती है जम कर खूब तेल-मालिश।
दिन-दिन भर उनसे बतियाती है जो सो !

जब किसी को ओठ गोल किए
कुछ बोलते देखें गडमड-
समझ लें- वह खड़ी है वहीं
या ऊंघ रही है वहीं खटिया के नीचे-
छोटा-सा पिल्ला गोद में लिये !
बडे़ रोब से घूमती है वह
इस पूरे कायनात में।
लोग अनदेखा कर देते हैं उसको
पर उससे क्या?
वह तो है लोगों की परछाईं !
और इस बात से किसको होगा भला इनकार
आप लांघ सकते हैं सातों समुंदर
बस अपनी परछाईं नहीं लांघ सकते ।

आम्रपाली

था आम्रपाली का घर
मेरी ननिहाल के उत्तर!
आज भी हर पूनो की रात
खाली कटोरा लिये हाथ
गुज़रती है वैशाली के खंडहरों से
बौद्धभिक्षुणी आम्रपाली।

अगल-बगल नहीं देखती,
चलती है सीधी-मानो खुद से बातें करती-
शरदकाल में जैसे
(कमंडल-वमंडल बनाने की ख़ातिर)
पकने को छोड़ दी जाती है
लतर में ही लौकी-
पक रही है मेरी हर माँसपेशी,
खदर-बदर है मेरे भीतर का
हहाता हुआ सत!

सूखती-टटाती हुई
हड्डियाँ मेरी
मरे कबूतर-जैसी
इधर-उधर फेंकी हुईं मुझमें।
सोचती हूँ-क्या वो मैं ही थी-
नगरवधू-बज्जिसंघ के बाहर के लोग भी जिसकी
एक झलक को तरसते थे?
ये मेरे सन-से सफ़ेद बाल
थे कभी भौरें के रंग के, कहते हैं लोग,
नीलमणि थीं मेरी आँखें
बेले के फूलों-सी झक सफ़ेद दन्तपंक्ति :
खंडहर का अर्द्धध्वस्त दरवाज़ा हैं अब जो!
जीवन मेरा बदला, बुद्ध मिले,
बुद्ध को घर न्योतकर
अपने रथ से जब मैं लौट रही थी

कुछ तरुण लिच्छवी कुमारों के रथ से
टकरा गया मेरे रथ के
धुर के धुर, चक्के से चक्का, जुए से जुआ!
लिच्छवी कुमारों को ये अच्छा कैसे लगता,
बोले वे चीख़कर-

‘‘जे आम्रपाली, क्यों तरुण लिच्छवी कुमारों के धुर से
धुर अपना टकराती है ?’

‘‘आर्यपुत्रो, क्योंकि भिक्खुसंघ के साथ
भगवान बुद्ध ने भात के लिए मेरा निमन्त्रण किया है स्वीकार !’’
‘‘जे आम्रपाली!
सौ हज़ार ले और इस भात का निमन्त्रण हमें दे!’’
‘‘आर्यपुत्रो, यदि तुम पूरा वैशाली गणराज्य भी दोगे,
मैं यह महान भात तुम्हें नहीं देनेवाली!’’
मेरा यह उत्तर सुन वे लिच्छवी कुमार
चटकाने लगे उंगलियाँ :
‘हाय, हम आम्रपाली से परास्त हुए तो अब चलो,
बुद्ध को जीतें!’
कोटिग्राम पहुँचे, की बुद्ध की प्रदक्षिणा,
उन्हें घर न्योता,
पर बुद्ध ने मान मेरा ही रख
और कहा-‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,
बाकी सब ढह जाएगा…’
‘‘तो बहा काल-नद में मेरा वैभव…
राख की इच्छामती,
राख की गंगा,
राख की कृष्णा-कावेरी,
गरम राख की ढेरी
यह काया
बहती रही
सदियों
इस तट से उस तट तक!
टिमकता रहा एक अंगारा,
तिरता रहा राख की इस नदी पर
बना-ठना,

ठना-बना
तैरा लगातार!
तैरी सोने की तरी!
राख की इच्छामती!
राख की गंगा!
राख की कृष्णा-कावेरी।
झुर्रियों की पोटली में

बीज थोड़े से सुरक्षित हैं-
वो ही मैं डालती जाती हूँ
अब इधर-उधर!
गिर जाते हैं थोड़े-से बीज पत्थर पर,
चिड़िया का चुग्गा बन जाते हैं वे,
बाक़ी खिले जाते हैं जिधर-तिधर
चुटकी-भर हरियाली बनकर।’’

सुनती हूँ मैं ग़ौर से आम्रपाली की बातें
सोचती हूँ कि कमंडल या लौकी या बीजकोष-
जो भी बने जीवन, जीवन तो जीवन है!
हरियाली ही बीज का सपना,
रस ही रसायन है!
कमंडल-वमंडल बनाने की ख़ातिर
शरदकाल में जैसे पकने को छोड़ दी जाती है
लतर में ही लौकी
पक रही है मेरी हर माँसपेशी तो पकने दो, उससे क्या ?
कितनी तो सुंदर है
हर रूप में दुनिया !


श्री एकान्त श्रीवास्तव

मायावी सरोवर की तरह
अदृश्‍य हो गए पिता
रह गए हम
पानी की खोज में भटकते पक्षी

ओ मेरे आकाश पिता
टूट गए हम
तुम्‍हारी नीलिमा में टँके
झिलमिल तारे

ओ मेरे जंगल पिता
सूख गए हम
तुम्‍हारी हरियाली में बहते
कलकल झरने

ओ मेरे काल पिता

ओ मेरे काल पिता
बीत गए तुम
रह गए हम
तुम्‍हारे कैलेण्‍डर की
उदास तारीखें

हम झेलेंगे दुःख
पोंछेंगे आँसू
और तुम्‍हारे रास्‍ते पर चलकर
बनेंगे सरोवर, आकाश, जंगल और काल
ताकि हरी हो घर की एक-एक डाल।


श्री पवन करण

बिटिया बड़े जतन से सिक्के जोड़ती
कान से सटाकर देखती बजाकर
गुल्लक में सिक्के खन-खन करते

पिता के सामने गुल्लक रखती
उसकी हथेली पर गुल्लक में भरने
एक सिक्का और रखते पिता
बिटिया जाती गुल्लक छुपाती माँ हँसती

बिटिया बड़ी हो चुकी, ब्याह हो चुका
जा चुकी अपने घर
कहाँ आ पाती है पिता के घर
चिट्ठियाँ आती हैं

जब कोई चिट्ठी उसकी आती है
घर में बसी उसकी यादें
गुल्लक में भरे सिक्कों-सी
खन-खन बजती हैं !


श्री पंकज सुबीर

ओ सावन के बादल जाकर देना इतनी सिर्फ निशानी ।
भय्या के हाथों को छूकर देना इन आंखों का पानी ॥

बाबूजी से पीर मेरी कोई भी मत कह देना सुन ले ।
कहना गुड्डी बिटिया तो हो गई है अब ससुराल की रानी ॥

मेरा नाम सुनेंगीं जब तो हुलस हुलस कर वो रोऐंगीं ।
अम्मा की आंखों से ममता बह निकलेगी बनकर पानी॥

पिंजरे का हीरामन अब भी गुड्डी-गुड्डी रटता होगा ।
कह देना तेरी वो गुड्डी हो गई है अब बहू सयानी॥

घर के इक कोने में मेरी गुड़िया भी रक्खी हो शायद।
कहना याद बहुत आती है तेरी लाडो बिटिया रानी ॥

अमरूदों के बाग में जाकर माली काका से कहना ये।
चोरी के अमरूदों की यादें हैं अब तो सिर्फ कहानी ॥

पिछवाड़े के नीम पे झूला डाला होगा काकाजी ने ।
उस झूले पर बैठ हुमकना पुरवय्या होगी मस्तानी ॥

नदिया के कानों में थोड़ा शरमा कर ये बतला देना।

आते माघ पूस तक बन जाएगी तू अम्‍मा से नानी ॥

आंगन के तुलसी चौरे पर कर आना तू संजा बाती ।
और कहना आशीष बनाए रखना तुलसी माता रानी।।


श्री कृष्णमोहन झा

यदि ठीक से पुकारो
तो चीज़ें फिर आ सकती हैं तुम्हारे पास

यह जो अवकाश
तुम्हारे विगत और वर्तमान के बीच
एक मरुथल सा फैला हुआ है
( तुम्हारे विस्मरण से
तुम्हारा आत्म जो इस तरह मैला हुआ है )
वह कुछ और नहीं
शब्द और अर्थ के बीच की दूरी है केवल
विकलता के सबसे गहन क्षण में जिसे
एक आरक्त पुकार से किया जा सकता है तय

शर्त सिर्फ़ यह है
कि उसे
आकांक्षा की अंतिम छोर पर जाकर पुकारा जाय

एक दिन
जब मैं अपनी भाषा के बन में
खोए हुए एक शब्द के लिए भटक रहा था
यहाँ से
वहाँ
और सोच नहीं पा रहा था कि जाऊँ कहाँ
कि अचानक
असंख्य रन्ध्रों से मुझे फोड़ती हुई
ज्वार की तरह एक पुकार निकली-
जीतपुर!
और मैंने पाया कि अर्थ से डबडबाया हुआ
पके जामुन की तरह भीगा हुआ एक शब्द
अपने डैने फैलाए हुए
मेरी जीभ पर उतर आया है…

ऐसा ही एक और वाकया है
जब शहर से मै छोड़े गए तीर सा लौट रहा था अपने घर
और भरी हुई स्मृतियों के साथ
सूखी नदी पार कर रहा था
तब अपनी आँखें बन्द करते हुए मैंने
मन ही मन ज़ोर से पुकारा बिछुड़े हुए दोस्तों के नाम
कि रेत में खोए हुए जिए हुए किस्से तमाम
नाव की चोट बनकर
मेरे घुटनों में कचकने लगे
और मैंने देखा-
धूल उड़ाते शोर मचाते
चालीस बरस पुराने बच्चों को अपने साथ
दौड़कर अपनी ही तरफ आते हुए…

अपने अनुभव से जानता हूँ मैं
कि जिस तरह लोग
दरवाजे पर होनेवाले दस्तक को ही नहीं
ख़ुद अपनी आवाज को भी अनसुना कर देते हैं

चीज़ें उस तरह सुनना बन्द नहीं करतीं
बल्कि वे
हमारी विस्मृति की ओट में बैठी हुईं
हर सच्ची पुकार के लिए उत्कंठित रहती हैं

उनकी अपेक्षा हमसे अगर कुछ है
तो वह यह
कि जब भी पुकारा जाय उन्हें
सही समय पर सही नाम से पुकारा जाय
एक अदृश्य हाथ से भयभीत
रात भर दड़बे में छटपटाता हुआ मुर्गा
जब ओस से भीगी हुई धरती को पुकारता है
तो अगले दिन के शोरबे और स्वाद को निरस्त करता हुआ
एक विस्फोट की तरह प्रकट होता है सूर्य

जब कुत्ते की जीभ से
टप्-टप् चू रहा होता है दोपहर का बुख़ार
तब फटे होंठ सूखे कंठ और सूनी आँखों की पुकार पर
वृक्षों को हहराती पत्तों की कलीन बिछाती धूल की पतंग उड़ाती हुई
एक जादूगरनी की तरह प्रकट होती है हवा

जब दुःख में आकंठ डूबा रहता है तन-मन
जब ख़ुद जीना बन जाता
मृत्यु का तर्पण
तब एक धधकती पुकार ही फिर से संभव करती है वह क्षण
जब जीने का मकसद
मरने के कारण में मिल जाता है

यद्यपि मुझे पता है
कि अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए
फिलहाल कुछ भी नहीं है मेरे पास
लेकिन मेरे अन्तःकरण के जल में झिलमिलाता है

एक छोटा सा विश्वास
कि जिन्हें हम कहते हैं चीज़ें
और जिसके प्रभामय स्पर्श के लिए मर-मर कर जीते हैं
पुकार हैं वे-
उत्कटता के सघनतम क्षणों में
हमारे रक्त से पैदा हुए असाध्य अर्थों की पुकार
और जिसे हम ईश्वर के नाम से पुकारते हैं बार-बार
वस्तुतः इन्हीं पुकारों का एक विराट समुच्चय है वह
जिसके सुमिरन के लिए लिखी जाती हैं कविताएँ
जिसके आवाहन के लिए किया जाता है प्रेम
और जिसे पाने के लिए प्राण दिए जा