साक्षात्कार

क्षेत्रीय निदेशक महोदय के साथ दर्पण अंक 14 के लिए एक साक्षात्कार

श्री मनोज कुमार वर्मा, क्षेत्रीय निदेशक, भारतीय रिज़र्व बैंक, बिहार और झारखंड (अध्यक्ष, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (बैंक), पटनाहमारे क्षेत्रीय निदेशक श्री मनोज कुमार वर्मा सुदीर्घ अवधि तक बैंक की सेवा में विभिन्न महत्वपूर्ण दायित्वों को संभालते रहे हैं। क्षेत्रीय निदेशक महोदय एक ओर जहाँ बैंकिंग, अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली संबंधी चिंतन-अनुचिंतन में गहरी रुचि लेते रहे हैं वहीं भाषा और संस्कृति के सवालों पर भी अपने सारगर्भित विचारों से बैंक की कार्यालयीन संस्कृति को एक रचनात्मक और ज्ञानात्मक स्वरूप देते रहे हैं। एक बैंकर होते हुए भी सर भाषा, साहित्य, संस्कृति, संगीत, समाज और जीवन-मूल्यों पर अपनी एक विशिष्ट समझ रखते हैं। “दर्पण” के नये अंक के लिए संपादकीय टीम द्वारा क्षेत्रीय निदेशक महोदय और आरबीआई, पटना के स्टाफ-सदस्यों के प्रति स्नेहमयी दृष्टि रखने वाली मैडम आदरणीया श्रीमती रीता वर्मा से लिया गया एक साक्षात्कार प्रस्तुत है, जिसमें उनसे बैंकिंग से लेकर भारतीय रिज़र्व बैंक की कार्यप्रणाली, बदलते हुए बैंकिंग परिवेश, बैंकों के सामाजिक-आर्थिक उत्तरदायित्वों से लेकर वर्तमान आर्थिक परिदृश्यों तक, भाषा से लेकर संगीत तक विभिन्न तरह के सवाल पूछे गए और उन्होंने सभी प्रश्नों का अत्यंत ज्ञानपरक और रोचक तरीके से तथा बेबाकी से उत्तर दिया। “दर्पण” के पाठकों के लिए प्रस्तुत है वह साक्षात्कार –

 दर्पण– सर, आप भारतीय रिज़र्व बैंक जैसी बैंकिंग क्षेत्र की अग्रणी और विनियामक संस्था में इतने लंबे अरसे तक जुड़े रहने पर कैसा महसूस करते हैं ?

क्षेत्रीय निदेशक– यह तो सपना सच होने जैसा है। इससे अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता है। बैंकिंग क्षेत्र की इस अग्रणी संस्था में स्वविवेक से कोई भी निर्णय लेने की छूट है। यह एक ऐसी संस्था है जो अपनी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के लिए प्रतिष्ठित है। यह मेरे लिए गौरव की बात है कि मैं इस संस्था से जुड़ा रहा हूँ और इसमें अपनी एक छोटी सी भूमिका निभाई है।

दर्पण– सर, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में खासकर वैश्वीकरण और उदारीकरण के परिप्रेक्ष्य में भारतीय रिज़र्व बैंक के योगदान को आप कैसे देखते हैं ?

क्षेत्रीय निदेशक– भारतीय रिज़र्व बैंक एक डायनामिक इंस्टीट्यूशन है जिसकी पॉलिसी समय के साथ परिवर्तित होती रही है। 1991 के बाद इस संस्था की सोच और कार्यप्रणाली में बदलाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सबसे अधिक बदलाव एक्सचेंज और विदेशी मुद्रा लेनदेन के क्षेत्र में हुआ। मुझे याद है कि जब मैं कानपुर कार्यालय में वि.मु.नि.वि. में पदस्थापित था तब50 डालर भी लाने और ले जाने में कठिनाई होती थी और इसके लिए लोगों को रिज़र्व बैंक आना पड़ता था जबकि अब फेमा कानून के तहत ढाई लाख डॉलर तक की लेनदेनबिना किसी अनुमति के की जा सकती है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के माहौल में बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव के रूप में बैंकों को सशक्त बनाया गया है और उन्हें ब्याज दर तय करने तथा अन्य क्षेत्रों में स्व-विवेक से निर्णय लेने के अधिकार दिए गए हैं। बैंकिंग को वैश्विक जगत से जोड़ने में भारतीय रिज़र्व बैंक का बहुत बड़ा योगदान रहा है। हाल के दिनों में स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, प्रधानमंत्री जन-धन योजना जैसे कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन में भारतीय रिज़र्व बैंक ने अहम भूमिका निभाई है। आरबीआई के कारण ही भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक जगत में एक महत्वपूर्ण पहचान मिली है। रिज़र्व बैंक ने [email protected] की शुरुआत की है जिससे स्टार्ट अप को एक मजबूती दी जा सके।

दर्पण – सर, बदलते हुए बैंकिंग और प्रशासनिक परिवेश में भारतीय रिज़र्व बैंक जैसी संस्था की सोच और कार्यप्रणाली में आपने क्या परिवर्तन देखा है ? आपके बैंक में आने के समय से लेकर आज के माहौल में आपकी दृष्टि से इस संस्था ने अपने आप को कैसे बदला है?

क्षेत्रीय निदेशक– भारतीय रिज़र्व बैंक की सोच और कार्यप्रणाली में पहले से काफी बदलाव हुआ है। पहले स्टाफ सदस्यों को बैंक की सुविधाओं को पाने में काफी मुश्किल होती थी जबकि आज सबकुछ घोषणा के आधार पर हो रहा है। अपने स्टाफ के प्रति बैंक का विश्वास बढ़ा है और पहले की तुलना में मैनपावर और कागज की बर्बादी में कमी आई है। बैंक की कार्यप्रणाली में सूचना प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका के कारण परिस्थितियां बदली हैं। बदलते समय और बैंकिंग परिवेश के अनुरूप अभी कार्यप्रणाली को तर्कसंगत बनाया गया है और नियमित पर्यवेक्षण पर जोर दिया जा रहा है। कुछ ही समय बाद ईडीएमएस प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन के बाद बैंक का कामकाज काफी हद तक पेपरलेस हो जाएगा जो एक पैराडाइम शिफ्ट होगा। बाहरी बदलावों को अगर देखा जाए तो बैंकों को पहले की तुलना में निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता दी गई है। पहले ग्रेड बी और सी स्तर के अधिकारी राज्य का मानचित्र देखकर यह तय करते थे कि कौन सा बैंक किस गांव में शाखा खोलेगा। अब ऐसा नहीं है। बैंकों को यह अधिकार दिया गया है कि वे स्वयं तय करें कि उन्हें कहां शाखा खोलनी है। अब रिज़र्व बैंक विनियामक  के रूप में सहभागितापूर्ण दिशा-निर्देश जारी करता है और अब हम कोई भी निर्णय लेने के पहले ड्राफ्ट दिशानिर्देशों को पब्लिक डोमेन में रखते हैं और सभी से अभिमत लेने के बाद ही कोई निर्णय लेते हैं।

दर्पण – सर, आपने बैंक के विभिन्न विभागों में पदस्थापित रहते हुए महत्वपूर्ण जिम्मदारियों को निभाया है । आपकी दृष्टि से कौन-सा विभाग आपको सर्वाधिक पसंद आया ?

क्षेत्रीय निदेशक– रिज़र्व बैंक के सभी विभाग चुनौतीपूर्ण रहे हैं। रिज़र्व बैंक के जिन विभागों में मैंने काम किया है उनमें निर्गम विभाग मुझे सबसे अच्छा लगा क्योंकि इस विभाग में अपने काम का परिणाम तत्काल दिखता है जबकि वित्तीय साक्षरता, रेग्यूलेशन, सुपरविज़न आदि से संबंधित कार्यों में बहुत देर के बाद परिणाम दिखता है।

दर्पण– सर, क्षेत्रीय निदेशक जैसे बड़े उत्तरदायित्वों वाले पद को सँभालने के क्रम में आपके सामने संभवत: अनेक चुनौतियों से भरे क्षण आए होंगे तथा कुछ त्वरित और निर्णायक फैसले लेने पड़े होंगे, इस संदर्भ में आपके क्या अनुभव रहे हैं जो आप हमसे साझा करना चाहते हैं।

क्षेत्रीय निदेशक-बिहार और झारखंड के क्षेत्रीय निदेशक का दायित्व चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यहाँ दो राज्यों को संभालना पड़ता है। इन राज्यों में अन्य प्रदेशों की तुलना में बुनियादी संरचना का अभाव है। हमें उपलब्ध बुनियादी संरचना में ही आज की चुनौतियों को पूरा करना है जबकि लोगों की अपेक्षाएं बहुत अधिक बढ़ गई हैं। पटना कार्यालय में 1968 में वॉल्ट बना। उस समय एटीएम सुविधा नहीं थी, बदले हुए परिवेश में जब नकदी की माँग बढ़ी है तथा आधारभूत संरचनाओं में ज्यादा विकास नहीं हुआ है। कालांतर में बैंकिंग क्षेत्र में बहुत सारे परिवर्तन हुए और आज कागजी लेनदेन से आगे निकलकर हम इलेक्ट्रानिक बैंकिंग, नेट बैंकिंग के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। आज आमजनता को वित्तीय रूप से शिक्षित करना जरूरी है और सबसे बड़ी चुनौती है उन लोगों का विश्वास बैंकिंग में बढ़ाना। सरकार और बैंक हमारे हितधारक हैं। हमारा प्रयास है कि सरकारी विभाग चालान सिस्टम को छोड़कर ई-कुबेर के माध्यम से लेनदेन करें। हमारी एक और बड़ी चुनौती है आमजनता को ई-बैंकिंग से जोड़ने की और हम निरंतर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

दर्पण – सर, जैसा कि हमें ज्ञात हुआ है, आपको किताबें पढ़ने और संगीत का खासकर पुराने हिंदी गीतों का बहुत शौक है, आपकी पसंद की पुस्तकें कौन-सी हैं, जिन्होंने आपको जीवन में प्रेरित किया है ?

क्षेत्रीय निदेशक– गोल्डन एरा के गाने मुझे बहुत पसंद हैं और जहाँ तक फिल्मी गानों की बात है तो मैं आज भी मो.रफी, किशोर कुमार और लता जी के सदाबहार नगमों को ही सुनना पसंद करता हूँ। इनके गीतों से मन को शुकून मिलता है।

जहाँ तक पुस्तकों की बात है तो मैं वित्तीय जगत की पुस्तकें पढ़ना पसंद करता हूं क्योंकि बैंकिंग जगत से जुड़े होने के कारण मेरी अभिरुचि भी वित्तीय क्षेत्र में है और वैश्विक जगत से हमारी अर्थव्यवस्था के जुड़े होने के कारण हमेशा अपने को अपडेट रखना भी जरूरी है।

दर्पण – मैडम, क्या जीवन में ऐसे कुछ क्षण आये जब सर किसी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करते हुए विचलित हुए हों और आपने उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित कर शक्ति दी हो ! ऐसी कोई घटना या परिस्थिति…

मैडम– ये भीतर से खुद बहुत दृढ़ व्यक्ति हैं। लेकिन जीवन के उतार-चढ़ाव में कई अवसर आते हैं जब दृढ़ से दृढ़ व्यक्ति भी कमजोर पड़ जाता है। ऐसी कुछ घटनाएं हैं। एक बार बी से सी ग्रेड में इनकी पदोन्नति नहीं हो पाई थी तो ये बहुत दुखी हुए थे। मैंने इनको भावनात्मक सहारा दिया जो इन्हें बहुत अच्छा लगा।

दर्पण– मैडम, जैसा कि हम जानते हैं कि आप विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होकर स्टाफ-सदस्यों और उनके परिवारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करती रही हैं, सबके साथ आत्मीय संवाद के लिए आपको सभी स्टाफ-सदस्य जानते हैं, इस संबंध में आप अपने अनुभव कैसे साझा करना चाहेंगी?

मैडम- इनके साथ पिछले 30 साल से मैं भी बैंक के लोगों से जुड़ी हुई हूँ और पूरा रिज़र्व बैंक मेरे लिए परिवार की तरह है। लोगों से मिलना-जुलना मुझे बहुत अच्छा लगता है और इस क्रम में मेरे कई मित्र बने।

दर्पण – सर, बैंक में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए खासकर क्षेत्रीय निदेशक के रूप में आप रिज़र्व बैंक में राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग की स्थिति को किस तरह देखते हैं ? क्या आप इससे संतुष्ट हैं ?

क्षेत्रीय निदेशक– राजभाषा के प्रयोग की स्थिति पर मैं बहुत खुश हूँ लेकिन अब भी संतुष्ट नहीं हूँ। अब भी बैंक के कई क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग अपेक्षित ढंग से नहीं हो पा रहा है। इसका कारण है कि हमारे स्टाफ सदस्य अलग-अलग क्षेत्र और पृष्ठभूमि से आते हैं। सबको साथ लेकर चलना एक चुनौती है। हमारे कार्य की गुणवत्ता तथा मुख्य कार्य अर्थात बैंकिंग को समय पर पूरा करना और साथ ही राजभाषा नीति को सही भावना के साथ कार्यान्वित करना चुनौतीपूर्ण है। हमारे बैंक में आज अधिकांश कार्य विभिन्न पैकेजों में हो रहे हैं और ऐसी स्थिति में सभी सॉफ्टवेयरों में हिंदी में काम करने की सुविधा होना जरूरी है।

इसके अलावा हमारी शिक्षा नीति में भी गलती होती रही है। बेहतर स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। किसी देश में ऐसा नहीं है कि आप पढ़ाई किसी माध्यम में करें और सरकारी कामकाज किसी और माध्यम में। आज सरकारी स्कूलों का स्तर ठीक नहीं है जिससे अधिकांश लोग अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके अलावा जो बड़ी बात है वह है कि आज कोई भी नौकरी पाने में आपको अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान होना बहुत जरूरी है। बैंकों में भी नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी का पेपर अनिवार्य है। शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और शिक्षा के स्तर पर ही हिंदी को पर्याप्त महत्व देने की आवश्यकता है।

दर्पण – सर, क्या हिंदी बैंकिंग कारोबार और वित्तीय समावेशन के अभियान को एक नया विस्तार देने के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है ? इस संबंध में कौन-से कदम उठाए जाने आवश्यक हैं ?

क्षेत्रीय निदेशक-वित्तीय समावेशन के कार्यक्रम में अंग्रेजी नहीं चल सकती है। इसके लिए हमें हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं का ही सहारा लेना पड़ेगा। हम हिंदी क्षेत्र के हैं इसलिए ज्यादा तकलीफ नहीं है।

दर्पण- सर, आप पटना कार्यालय में उप महाप्रबंधक के रूप में और पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्रीय निदेशक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभाते रहे हैं, उस समय के पटना कार्यालय के माहौल, उस समय की चुनौतियों और आज के माहौल तथा आज की चुनौतियों में क्या फर्क आपने महसूस किया है ?

क्षेत्रीय निदेशक- चुनौतियाँ पहले भी थीं, आज भी हैं और आगे भी रहेंगी। पहले रिज़र्व बैंक अंतर्मुखी संस्था के रूप में काम करता था और आम लोगों से बहुत कम सरोकार रखता था। जब मैं उप महाप्रबंधक था तब का समय संक्रमण कालथा- मैनुअल से मेकैनिकल फेज़ में हम जा रहे थे। पहले कंप्यूटर नहीं था और रजिस्टरों में हाथ से प्रविष्टि करनी होती थी। लेकिन आज समय बदला है। आज एक आम आदमी भी रिज़र्व बैंक को जानता है और उनकी उम्मीदें बढ़ी हैं,  इसलिए अब चुनौतियां अधिक हैं। बैंकों को स्वायतता दी गई है लेकिन अब उनका पर्यवेक्षण एक चुनौती है और सभी बैंक हमारे रडार पर 24×7 हैं।

दर्पण – सर, बिहार की आर्थिक परिस्थितियों में सुधार के लिए तथा यहाँ निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाए जाने के लिए कौन-से जरूरी कदम उठाए जाने आवश्यक हैं ?

क्षेत्रीय निदेशक– आज हर बात को शोकेस करना बहुत जरूरी है। हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे राज्य में एक भी ऐसा जिला नहीं है जिसे हम मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकें। कानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है, मारपीटऔर हफ्ता वसूली की घटनाएं आम बात है। इसलिए बाहर सही सिग्नल नहीं जाता है। हमारे राज्य में उद्यमिता की भी कमी है। हमारे युवा नौकरी पर अधिक जोर देते हैं और व्यवसाय के प्रति उनमें उदासीनता दिखती है। मानसिकता बदलने की अवश्यकता है। बिजली की स्थिति दयनीय है। निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाने पर राज्य सरकार को जोर देना पड़ेगा।

दर्पण – सर, बिहार में बैंकिंग कारोबार को बढ़ाए जाने, इसे सशक्त और लाभप्रद बनाए जाने के लिए आपकी दृष्टि से क्या उपाय किए जाने चाहिए ?

क्षेत्रीय निदेशक– अब यह तय किया गया है कि 5000 आबादी वाले पंचायत में ब्रिक एंड मोर्टार ब्रांच खोला जाए। गरीबों के लिए केवायसी में ढील दी गई है। लघु उद्योगों पर अधिक जोर दिए जाने की जरूरत है। हमारे राज्य में फलों और मखाना की अच्छी खेती होती है। इनसे जुड़े लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हमने 150 एमएसएमई प्रबंधकों को प्रशिक्षण दिया है। हमारा मुख्य फोकस क्षमता निर्माण पर है।

दर्पण – सर, बिहार में ऋण-जमा अनुपात को सुधारने की दिशा में आपकी दृष्टि में और कौन-से सकारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।

क्षेत्रीय निदेशक– बिहार में निवेश की संभावना नगण्य है। लोग पहले से अनधिकृत गैर-बैंकिंग संस्थाओं से धोखा खा चुके हैं इसलिए जोखिम नहीं लेना चाहते। इसलिए अधिकांश पैसे बैंकों में जमा हो रहे हैं जिससे डिपॉज़िट काफी बढ़ा है लेकिन क्रेडिट नहीं बढ़ पाया है। इस अनुपात को सुधारने के लिए आवश्यक है कि निवेश हो और ऋण दिए जाएं। हमारे लिए यह सुखद है कि प्रधानमंत्री कार्यबल के सभी लक्ष्यों को पूरा किया गया है।

दर्पण – सर, आप बैंक में नवनियुक्त अधिकारियों और सहायकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे ?

क्षेत्रीय निदेशक– आज के युवाओं में पंख लगा हुआ है और वे ऊँची उड़ान भरना चाहते हैं लेकिन यह जरूरी है कि आज आप जिस भूमिका में हैं वहाँ पूरे समर्पण और ईमानदारी के साथ काम करें। हमारे भूतपूर्व गवर्नर डॉ. डी.सुब्बाराव ने एक बार कहा था कि रिज़र्व बैंक का काम निर्गम विभाग के काम से होता है नकि गवर्नर के भाषण से। पेशेवर दृष्टिकोण और सत्यनिष्ठा को अक्षुण्ण बनाए रखना होगा और भ्रष्टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस रखनी होगी।

जब मैं क्षेत्रीय निदेशक के रूप में पटना आया था तो मुझे पता था कि अब मेरी पदोन्नति नहीं होनी है लेकिन मैंने पूरे उत्साह के साथ काम किया और अब भी कर रहा हूँ। हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि रिज़र्व बैंक से ही हमारी मान-मर्यादा है इसलिए संस्था की प्रतिष्ठा को कोई दाग नहीं लगना चाहिए। हमारे अधिकारियों को हमेशा अलग दिखना चाहिए। सभी में नेतृत्व क्षमता आवश्यक है।

दर्पण – सर, आपने इस साक्षात्कार के लिए अपना बहुमूल्य समय दिया, इसके लिए “दर्पण” की संपादकीय टीम आपके और मैडम के प्रति आभार व्यक्त करती है।